आदेश के बावजूद सीसीटीवी फुटेज किए नष्ट, पुलिस कार्यशैली पर लगा प्रश्नचिन्ह
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में सबूत नष्ट होने पर पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने अपने जजमेंट में ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए और मामले के गुण-दोष पर फैसला करते हुए जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज पेश न करना, अभियोजन पक्ष के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष माना जाए। कोर्ट ने ये निर्देश हनुमानगढ़ जंक्शन के वार्ड नंबर 52 सुआशिया निवासी सावित्री देवी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद अंतिम फैसले में दिए।
महिला याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के 38 वर्षीय बेटे को पुलिस ने झूठा फंसाया है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वकील ने बताया कि पुलिस की कहानी के अनुसार 20 दिसंबर 2022 को गश्त के दौरान जोधपुर नंबर की एक स्विफ्ट कार और एक बोलेरो पिकअप को बीकानेर-सूरतगढ़ नेशनल हाईवे स्थित हिंडोर टोल प्लाजा पर रोका गया था। पुलिस का दावा है कि स्विफ्ट कार से 76 किलो पोस्त बरामद हुआ, जिसके आधार पर थाना राजियासर (श्रीगंगानगर) में एनडीपीएस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई। वकील ने तर्क दिया कि बोलेरो पिकअप से कोई बरामदगी नहीं हुई थी और स्विफ्ट कार से बताई गई जब्ती पूरी तरह से मनगढ़ंत है। वकील ने तर्क दिया कि वास्तव में पुलिस से स्विफ्ट कार का साइड मिरर टूटने को लेकर विवाद हुआ था। वकील ने कोर्ट को बताया कि यह कथित घटना 20 दिसंबर 2022 को सुबह लगभग 11.10 बजे से शाम 7 बजे के बीच हिंडोर टोल प्लाजा पर हुई थी।
वकील ने तर्क दिया कि सच्चाई सामने लाने के लिए 4 जनवरी 2023 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सूरतगढ़ की कोर्ट में धारा 91 के तहत आवेदन कर टोल प्लाजा के सुबह 8.45 से दोपहर एक बजे तक के सीसीटीवी फुटेज मांगे गए थे। ट्रायल कोर्ट ने फुटेज पेश करने के निर्देश दिए थे। वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने बार-बार समय मांगा और बाद में टोल प्लाजा प्रबंधन ने डेटा डिलीट होने की जानकारी दी। वकील ने यह भी तर्क दिया कि जब आरोपित ने अपने खर्च पर डेटा रिकवर कराने की पेशकश की, तो अभियोजन ने उसका भी विरोध किया। कोर्ट ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज कई महत्वपूर्ण तथ्यों को स्थापित कर सकते थे। कोर्ट ने पाया कि ये फुटेज साबित कर सकते थे कि दोनों गाडिय़ां टोल प्लाजा पर कैसे और कब पहुंची, पुलिसकर्मियों की वहां क्या गतिविधियां थीं और तलाशी की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य नियम की व्याख्या की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एविडेंस एक्ट की धारा 61, 62 और 64 के तहत अदालत में सबसे प्रत्यक्ष सबूत पेश किए जाने चाहिए। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि इस स्वीकृत तथ्य को देखते हुए कि सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अर्थात् हिंडोर टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज को समय पर मांग और स्पष्ट न्यायिक निर्देशों के बावजूद न तो संरक्षित किया गया और न ही पेश किया गया, ट्रायल कोर्ट अनिवार्य रूप से इस चूक पर ध्यान देगा और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 दृष्टांत (जी) (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 119) में सन्निहित सिद्धांत को लागू करेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं कर रहा है। याचिका का निस्तारण करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए और मामले के गुण-दोष पर फैसला करते हुए यह प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले कि जो इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अभियोजन के नियंत्रण में था और पेश किया जा सकता था, उसे रोक लिया गया या डिलीट होने दिया गया, और यदि उसे पेश किया जाता, तो वह अभियोजन पक्ष के प्रतिकूल होता।




