सह आरोपित के बयान के आधार पर किसी को मुकदमे में फंसाना न्यायसंगत नहीं-उच्च न्यायालय

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जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट के मामले में गंभीर टिप्पणी की है कि पुलिस को पर्याप्त सबूत होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं है। ट्रायल कोर्ट को चार्ज फ्रेम करते समय गौर करना चाहिए कि कोई कमी है तो बेगुनाह को मुआवजा दिलाने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का इस्तेमाल करें। केवल सह आरोपित के बयान के आधार पर किसी को मुकदमे में फंसाना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि ऐसे मामलों में बेगुनाह को न सिर्फ़ कस्टडी में रहना होगा, बल्कि बेवजह केस की प्रक्रिया से भी जूझना पड़ता है। कोर्ट ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक को आदेश की कॉपी भेजकर कार्रवाई की अपेक्षा की है, ताकि धरातल पर पुलिस की लापरवाही की वजह से बेगुनाहों को परेशानी न हो।

न्यायाधीश अशोक कुमार जैन ने ब्यावर जेल में बंद अक्षय की जमानत मंजूर कर रिहा करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने टिप्पणी की है कि लगता है किसी व्यक्ति का नाम लेकर उसे ट्रायल का सामना करने को मजबूर करने के लिए कानूनी सबूत की ज़रूरत नहीं है। इसकी वजह है कि चार्जशीट की सिफारिश से पहले प्रॉसिक्यूशन से सलाह लेने की व्यवस्था की कमी है। इस मामले में सबूतों की कमी है और ट्रायल के लिए सबूत पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन सभी पहलुओं पर विचार किया जाता तो याचिकाकर्ता को मुकदमे में उलझने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। स्वतंत साक्ष्यों के अभाव में केवल सह आरोपी के बयान के आधार पर आरोपी बनाना और उसे ट्रायल का सामना मजबूर करना गंभीर चिंता का विषय है।

मामला ब्यावर सदर थाना में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने 18 फरवरी 2026 को जवान सिंह से 27.77 ग्राम स्मैक बरामद की। पूछताछ के दौरान जवान सिंह ने सप्लाई चेन में अक्षय का नाम लिया। हालांकि, अक्षय से कोई बरामदगी नहीं हुई। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने उसके खिलाफ भी चालान पेश कर दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अन्य सह-आरोपिताें को उच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है। याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रत्यक्ष साक्ष्य या बरामदगी नहीं है।

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