प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि कोई भी व्यक्ति बालिगों द्वारा अपनी पसंद से की गई शादी को सम्मान का मुद्दा नहीं बना सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में राज्य का दायित्व है कि वह दम्पति के जीवन, स्वतंत्रता और सम्पत्ति की रक्षा करे, भले ही खतरा उनके अपने परिवार से ही क्यों न हो।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें अलीगढ़ के एक दम्पति ने अपनी सुरक्षा की मांग की है। दोनों ने अपनी मर्जी से आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था और उनके पास वैध विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र भी था।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि महिला के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ हैं और उन्होंने झूठा आपराधिक मामला दर्ज करा दिया। दम्पति ने संयुक्त हलफनामा दाखिल कर यह भी आशंका जताई कि उन्हें “ऑनर किलिंग” का खतरा है। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए कहा, “किसी बालिग के निजी निर्णय को सम्मान का मुद्दा नहीं बनाया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने सम्बंधित पक्ष को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही अंतरिम राहत देते हुए अदालत ने आदेश दिया कि इस मामले में दम्पति को गिरफ्तार न किया जाए।
अदालत ने महिला के परिवार के सदस्यों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि वे दम्पति को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाएं। उनके वैवाहिक घर में प्रवेश न करें और न ही सीधे या किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सम्पर्क करें। इसके अलावा, अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया कि वह सुनिश्चित करें कि दम्पति को किसी भी प्रकार का खतरा न हो। कोर्ट मामले की अगली सुनवाई 08 अप्रैल को करेगी।



