{ब्रह्मा नन्द पाण्डेय }
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि सक्षम प्राधिकारी और राज्य सरकार एक बार किसी व्यक्ति के जाति प्रमाण पत्र की जांच कर उसे वैध घोषित कर चुके हैं, तो उसी शिकायत पर बार-बार जांच की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। न्यायालय ने रेखांकित किया कि प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक कार्यवाहियों में निरंतरता और अंतिमता का सिद्धांत लागू होना चाहिए, अन्यथा यह संबंधित पक्ष का अनावश्यक उत्पीड़न होगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने अफजाल अहमद व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं के ’भिश्ती अब्बासी’ (पिछड़ा वर्ग) होने के प्रमाण पत्र को लेकर वर्ष 2011 में एक शिकायत दर्ज की गई थी। इस शिकायत पर जिला स्तरीय जाति जांच समिति ने दो बार जांच की और दोनों ही बार प्रमाण पत्रों को वैध पाया। यहां तक कि राज्य सरकार ने भी वर्ष 2015 में इन शिकायतों को निराधार मानते हुए मामले को रफा-दफा करने का आदेश दिया था।
अदालत ने पाया कि मूल शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद उनके पुत्र (प्रतिवादी संख्या 5) द्वारा क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय समितियों के माध्यम से मामले को बार-बार पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कोई नया साक्ष्य या धोखाधड़ी का ठोस प्रमाण न हो, तो केवल आरोपों के आधार पर बंद हो चुके प्रकरण को दोबारा नहीं खोला जा सकता। न्यायालय ने यह भी माना कि सेवा संबंधी मामलों में किसी तीसरे पक्ष (अजनबी) को तब तक हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है जब तक कि वह कोई प्रत्यक्ष कानूनी क्षति साबित न कर दे।
अंततः हाईकोर्ट ने राज्य स्तरीय जाति संवीक्षा समिति और क्षेत्रीय समिति द्वारा पारित उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें दोबारा जांच के निर्देश दिए गए थे। अदालत ने जिला स्तरीय समिति के वर्ष 2014 और 2016 के उन आदेशों को प्रभावी बनाए रखने का निर्देश दिया है जिनमें याचिकाकर्ताओं के जाति प्रमाण पत्रों को सही पाया गया था। इसी के साथ याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध लम्बित सभी जाति सत्यापन संबंधी कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया गया है।










