नेपाल में सरकारी विज्ञापन नीति का विरोध, अखबारों ने पहले पृष्ठ पर नहीं छापे समाचार

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काठमांडू। नेपाल से प्रकाशित कुछ प्रमुख अखबारों ने सोमवार को पहले पृष्ठ पर समाचार नहीं प्रकशित किये। इसके बजाय प्रश्नवाचक चिन्ह प्रकाशित करके सरकारी विज्ञापन नीति का विरोध जताया है।

काठमांडू से प्रकाशित दैनिक नेपाल समाचारपत्र, कारोबार, राजधानी, आर्थिक अभियान, सौर्य, मध्यान्ह, प्रभाव, प्रक्षेपण आदि ने यह कदम उठाया है।इसी तरह काठमांडू से बाहर प्रकाशित ब्लास्ट टाइम्स, बुटवल टुडे, दैनिक पत्र, लुम्बिनी, सुदूर सन्देश, मिशन टुडे, काँक्रेविहार सहित अन्य अखबारों ने भी पहले पृष्ठ पर समाचार प्रकाशित नहीं किए हैं।

नेपाल के प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय ने 1 अप्रैल को निजी मीडिया में सरकारी सूचना प्रकाशित न करने का प्रावधान किया है। फिलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है, लेकिन प्रकाशकों ने सार्वजनिक निकायों के सार्वजनिक खरीद समेत सभी सरकारी सूचनाएं केवल सरकारी मीडिया में ही प्रकाशित और प्रसारित करने के निर्णय के विरोध में पहले पृष्ठ पर समाचार की जगह प्रश्नवाचक चिन्ह प्रकाशित किए हैं।

काठमांडू से प्रकाशित होने वाले मध्यान्ह दैनिक के प्रधान संपादक मदन कुमार श्रेष्ठ ने बताया कि मीडिया एलायंस और मीडिया सोसाइटी से परामर्श के बाद यह कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा कि हमने सरकार के उस निर्णय पर सवाल उठाया है, जो संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को छीनता है।

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नेपाल पत्रकार महासंघ की अध्यक्ष निर्मला शर्मा ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। उनका कहना है कि सरकार का यह निर्णय संविधान के सुनिश्चित प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है। उनके अनुसार इससे श्रमजीवी पत्रकारों और उनके स्व-रोजगार के अधिकारों का भी हनन हुआ है।

नेपाल में मीडिया द्वारा उठाए गए कुछ प्रमुख सवाल:

1. सूचना किसके लिए है? क्या नागरिकों को सूचित रखने के लिए केवल एक ही माध्यम पर्याप्त है? क्या सरकारी सूचनाओं के लिए केवल सरकारी मीडिया पर निर्भर बनाना नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं है?

2. जब समाचार के स्रोत अलग-अलग हो सकते हैं, तो सूचना और विज्ञापन का स्रोत एक ही होना क्या उचित है? क्या सभी सरकारी सूचनाओं और ठेकों को केवल सरकारी मीडिया तक सीमित कर कुछ चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने की कोशिश नहीं की जा रही है?

3. संविधान ने नागरिकों के सूचित होने के अधिकार की गारंटी दी है, तो सरकारी और गैर-सरकारी मीडिया में भेदभाव क्या इस अधिकार का उल्लंघन नहीं है?क्या यह नीति गैर-सरकारी मीडिया को आर्थिक रूप से कमजोर कर प्रेस स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश नहीं है?

4. क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश पाने वाली सरकार का यह कदम उचित है?

5. क्या सरकारी विज्ञापन और सूचनाओं पर रोक से निजी मीडिया, मुद्रण, कुरियर, हाकर व्यवसाय, रोजगार और पत्रकारिता शिक्षा प्रभावित नहीं होगी?

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