आपराधिक मामले में जमानत पर चल रहे व्यक्ति को विदेश जाने से रोकना गलत

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बिना कारण बताए अनापत्ति देने से इन्कार सही नहीं,नये सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महराजगंज जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र के वजीर आलम की याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), महराजगंज के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें आवेदक को विदेश यात्रा के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) देने से इन्कार किया गया था।

मामला 2021 के एक आपराधिक केस से जुड़ा है, जिसमें धारा 323, 504, 325 और 308 आईपीसी के तहत कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज है। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि आवेदक एक गरीब व्यक्ति है, जिस पर दो नाबालिग बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है, और वह रोजगार के लिए विदेश जाना चाहता है। यह भी बताया गया कि मुकदमे की पैरवी उसके परिवार के सह-आरोपी सदस्य करेंगे और आवेदक ने अदालत में हाजिर होने का वचन भी दिया है।

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न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत ने एनओसी अस्वीकार करने के लिए कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया और 25 अगस्त 1993 की केंद्र सरकार की अधिसूचना पर भी विचार नहीं किया।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि आवेदक पहले किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया है और मामले में अधिकतम सजा सात वर्ष से कम है, यानी अपराध जघन्य श्रेणी में नहीं आता। हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि यदि आवेदक 10 दिनों के भीतर नया आवेदन दाखिल करता है, तो उसका निस्तारण 15 दिनों के भीतर विहित सिद्धांतों के आलोक में किया जाए।

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