गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी और चिकन बिरयानी खाने के मामले में आरोपितों की जमानत याचिका खारिज

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वाराणसी। गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी और चिकन बिरयानी खाने के मामले में 14 आरोपियों को बड़ा झटका लगा है। सोमवार को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या-9 ने प्रकरण में आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी । यह मामला थाना कोतवाली क्षेत्र से संबंधित है, जिसमें विभिन्न गंभीर धाराओं—धारा 298, 299, 196(1)(बी), 279, 223(बी), 308(5) बी.एन.एस. तथा 67 आईटी एक्ट—के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान वादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी, राजकुमार तिवारी, राजेश त्रिवेदी एवं आशुतोष शुक्ला ने प्रभावी और तथ्यपरक बहस प्रस्तुत की। अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट किया कि आरोपितों द्वारा किए गए कृत्य न केवल गंभीर प्रकृति के हैं, बल्कि समाज में विधि-व्यवस्था एवं सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित करने वाले भी हैं। उन्होंने तर्क रखा कि आरोपितों के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया मजबूत हैं तथा उनकी रिहाई से साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका बनी रहेगी।

वादी पक्ष के अधिवक्ताओं ने न्यायालय को अवगत कराया कि प्रकरण में दर्ज एफआईआर, केस डायरी तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपितों की संलिप्तता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। साथ ही, यह भी बताया गया कि मामले की विवेचना अभी प्रचलित है और ऐसे में आरोपितों को जमानत प्रदान करना न्यायहित में उचित नहीं होगा। वहीं, अभियोजन पक्ष ने जमानत प्रार्थना पत्र का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपितों द्वारा किया गया अपराध गंभीर प्रकृति का है, जिसमें कठोर दंड का प्रावधान है। अभियोजन ने यह भी दलील दी कि यदि आरोपितों को जमानत दी जाती है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ताओं ने भी अपना पक्ष रखा। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने एवं उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करने के उपरांत यह पाया कि मामले के तथ्य एवं परिस्थितियाँ जमानत प्रदान करने के अनुकूल नहीं हैं। वादी पक्ष के अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने बताया कि न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपितों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप स्थापित होते हैं तथा विवेचना की वर्तमान स्थिति को देखते हुए जमानत का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता। न्यायालय ने सभी आरोपितों की जमानत याचिका को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि प्रकरण की गंभीरता एवं उपलब्ध साक्ष्यों को दृष्टिगत रखते हुए यह निर्णय न्यायोचित है।

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