भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों पर नए विमर्श को प्रस्तुत करती पुस्तक ‘रामायण – प्रश्नों के स्वर’ का लोकार्पण

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नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र पर केंद्रित पुस्तक ‘रामायण – प्रश्नों के स्वर’ का भव्य लोकार्पण नई दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी के सभागार में शुक्रवार शाम को संपन्न हुआ। पुस्तक के लेखक एवं इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रकाशक डॉ. संजीव कुमार हैं।

कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया, डॉ. प्रेम जनमेजय, डॉ. प्रताप सहगल सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार रणविजय राव ने किया।

लोकार्पण अवसर पर चर्चा में अपने विचार व्यक्त करते हुए ममता कालिया ने कहा कि ‘रामायण – प्रश्नों के स्वर’ रामायण के पात्रों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर प्रदान करती है। यह पुस्तक पाठकों के समक्ष ऐसे प्रश्न रखती है जो स्थापित मान्यताओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके अनुसार, पुस्तक यह संदेश देती है कि साहित्य के किसी भी पात्र या प्रसंग को प्रश्नों और विमर्श से परे नहीं रखा जा सकता।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि पुस्तक छोटे-छोटे सर्गों में विभाजित है, जिनमें लेखक ने रामायण के विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत करते हुए उसने प्रश्नों और विवाद के बीज डाले हैं। यह कृति पाठकों को चिंतन और विमर्श की दिशा में अग्रसर करती है।

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साहित्यकार राजेश श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में कहा कि रामायण केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला सांस्कृतिक आधार है। रामायण का आरंभ भी प्रश्नों से होता है और इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लेखक ने ‘प्रश्नों के स्वर’ के माध्यम से विषय को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक पाठकों को गहन चिंतन की ओर ले जाती है।

इस अवसर पर डॉ. लक्ष्मी शंकर बाजपेयी, प्रो. संध्या वात्स्यायन तथा डॉ. सविता चड्ढा सहित अन्य वक्ताओं ने भी पुस्तक के विविध पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय संबोधन देते हुए डॉ. प्रताप सहगल ने पुस्तक पर सारगर्भित चर्चा कर समापन किया।
पुस्तक की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए लेखक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि रामायण के गहन अध्ययन के दौरान उनके मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने अंततः इस पुस्तक का रूप लिया। उन्होंने कहा कि रामायण आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी और भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
कार्यक्रम में अनेक साहित्यकारों, लेखकों एवं साहित्य-प्रेमियों की उपस्थिति रही। इनमें डॉ. मनोरमा, डॉ. ललित सिंह, ममता किरण, रेनू मिश्रा, आलोक शुक्ला, ओमप्रकाश प्रजापति, मोहनी पांडे, अश्विनी खंडेलवाल, डॉ. सीमा भारती झा, शकुंतला मित्तल, शशि सहगल, आचार्य राजेश कुमार, अनिरुद्ध गौड़, रोहित राय और राजेश्वर वशिष्ठ प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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