बिहार के मधेपुरा में न्याय के लिए 16 साल से भटक रहा है परिवार

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मधेपुर। समृद्धि यात्रा के क्रम में मुख्यमंत्री नितीश कुमार अभी मधेपुरा में प्रवास पर हैं। उन्हें नवनिर्मित पुलिस लाइन का उद्घाटन करना था । इसके लिए रातों रात अतिक्रमण का हवाला देते हुए कई पक्के निर्माण और हरे-हरे वृक्ष काट दिए गए। लेकिन 16 साल से एक गरीब पान विक्रेता को न्यायलय आदेश के बाबजूद उनकी जमीन पर कब्ज़ा नहीं दिलाया गया है, जबकि विभिन्न कार्यालयों से आधा दर्जन से अधिक आदेश पत्र जारी हो चुके हैं।

पीड़ित देव नारायण यादव अपनी बात रखने के लिए मुख्यमंत्री के जनसंवाद स्थल भी गए लेकिन सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें सभा स्थल तक जाने ही नहीं दिया गया। पीड़ित की माने तो जिसने जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है वह दबंग प्रवृति का है और राजनीति के साथ-साथ प्रशासनिक महकमें में भी पैठ रखता है।

क्या है मामला

शहर के वार्ड नम्बर – 14 निवासी देव नारायण यादव और सुधीर यादव दोनों भाइयों ने रहने के उद्देश्य से अपनी-अपनी पत्नी के नाम से वर्ष 2009 में 15 धूर (1500 स्कावयर फीट) जमीन ख़रीदी। लेकिन इसमें से उनके कब्जे में सिर्फ 9.16 धुर की जमीन आयी। ये लोग बची हुई जमीन पर कब्ज़ा दिलाने के लिए एसडीएम मधेपुरा को आवेदन दिया। तत्कालीन एसडीएम , आईएएस गोपाल मीणा ने मामले को बीएलडीआर में डीसीएलआर कोर्ट को भेज दिया। डीसीएलआर ने जमीन की दो बार मापी करवायी। जिसमें दो लोगों द्वारा जमीन का अतिक्रमण किये जाने की बात सामने आयी।

डीसीएलआर ने 23/12/2010 को सीओ और थाना अध्यक्ष को जमीन खाली कराने का आदेश दिया। लेकिन आज तक जमीन खाली नहीं करायी गयी। इस बीच पिछले 16 साल में विभिन्न कार्यालयों से जमीन खाली करने के लिए सिर्फ आदेश ही जारी हुए। देवनारायण यादव ने बीते 16 फरवरी को एक बार फिर से जिला अधिकारी के जनता दरबार में आवेदन दिया है। जिसपर डीएम ने मामले की जांच कर कारवाई का आदेश 18 फरवरी को एसडीएम और डीसीएलआर को दिया, लेकिन आदेश के 25 दिन बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

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15 साल पहले ही जमा कर चुके हैं पुलिस और मजिस्ट्रेट का चार्ज

पीड़ित का कहना है कि पूर्व के आदेश के आलोक में उन्होंने अतिक्रमण खाली कराने के लिए मजिस्ट्रेट और पुलिस बल के एक दिन का वेतन भी एसपी ऑफिस के नजारत और अनुमंडल नजारत में फ़रवरी 2011 में ही जमा कर दिया था। बाबजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पीड़ित का कहना है कि पान बेच कर दो परिवारों का किसी तरह गुजरा होता है कार्यालयों के चक्कर में व्यवसाय भी ठप हो गया है।

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