रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने गांवों में ग्राम विकास समिति और आदिवासी विकास समिति के गठन को चुनौती देने वाली सुनील उरांव की जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इन समितियों का गठन पंचायतों की शक्तियों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और इसका उद्देश्य गांवों के विकास कार्यों में लोगों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना है।
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ग्राम विकास समिति का गठन ग्राम सभा की शक्तियों को कम नहीं करता। याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि 13 मार्च 2018 का राज्य सरकार का प्रस्ताव कानून के विरुद्ध है।
याचिकाकर्ता सुनील उरांव ने राज्य सरकार के 13 मार्च 2018 के प्रस्ताव को चुनौती दी थी, जिसके तहत हर गांव में ग्राम विकास समिति या आदिवासी विकास समिति बनाने का निर्णय लिया गया था। याचिका में कहा गया था कि यह कदम झारखंड पंचायत राज एक्ट, 2001 और भारत के संविधान के आर्टिकल 243जी के विपरीत है, क्योंकि ग्राम पंचायत और ग्राम सभा पहले से ही गांव के विकास कार्यों के लिए अधिकृत हैं।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि इन समितियों का उद्देश्य स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना है। समिति केवल पांच लाख रुपये तक के छोटे विकास कार्य कर सकती है और यह प्रखण्ड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के प्रशासनिक व वित्तीय नियंत्रण में काम करती है, जिससे पंचायत की शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ता।









