नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को इस बात पर चिंता जताई कि देश की सरकारों ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कानून नहीं बनाए। जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण से पूछा कि संसद ने बरनवाल फैसले के पहले कोई कानून क्यों नहीं बनाया।
दरअसल, 2023 में अनूप बरनवाल के फैसले में ही उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति वाले पैनल में चीफ जस्टिस को शामिल करने का आदेश दिया था। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने प्रशांत भूषण से पूछा कि बरनवाल फैसले के पहले संसद ने कानून क्यों नहीं बनाया, तो प्रशांत भूषण ने कहा कि हर सरकार ने कानून नहीं होने का लाभ उठाया। इसी वजह से सरकारें इसका दुरुपयोग करती रही हैं। जब लोग विपक्ष में होते हैं तो कहते हैं कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन जब सत्ता में होते हैं, तो इस बारे में सोचना बंद कर देते हैं।
छह मई को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से पेश वकील विजय हंसारिया से पूछा था कि क्या कोर्ट संसद को ये निर्देश दे सकती है कि वो निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की भूमिका को भी शामिल करने के लिए कानून बनाएं। कोर्ट ने कहा था कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है। तब हंसारिया ने कहा था कि कोर्ट किसी भी कानून का संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत परीक्षण कर सकता है।
इस मामले में एडीआर के अलावा एक याचिका जया ठाकुर ने दायर की है। याचिका में चयन समिति में चीफ जस्टिस को भी रखने की मांग की गई है। इस मामले पर उच्चतम न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले कुछ वकीलों ने भी याचिका दायर कर रखी है। याचिका में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद केंद्र सरकार की ओर से लाए गए नए कानून को चुनौती देते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियों में देश के चीफ जस्टिस को भी पैनल में शामिल करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि चुनाव में पारदर्शिता लाने के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल में चीफ जस्टिस को भी शामिल किया जाना जरुरी है।
उच्चतम न्यायालय ने 2 मार्च, 2023 में अपने एक फैसले में कहा था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल में चीफ जस्टिस को भी शामिल किया जाएगा। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस फैसले पर एक नया कानून बनाकर नियुक्ति प्रक्रिया में चीफ जस्टिस के बजाय सरकार का एक कैबिनेट मंत्री शामिल कर दिया था।









